जवाबदेही के लिए सत्ता से सवाल जरूरी : पूर्व जज एस मुरलीधर

दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज एस मुरलीधर ने कहा है कि वकील और जज के रूप में मैंने समझा कि सत्ता में बैठे लोगों को जवाबदेह बनाने का एकमात्र असरदार तरीका मजबूत न्यायपालिका है। न्यायपालिका को ऐसे लोगों का हाथ थामना चाहिए जो सरकार से जवाब मांग रहे हैं। जितने ज्यादा जज ये समझेंगे कि संवैधानिक अदालत के रूप में उनका यह बुनियादी कर्तव्य है, उतना ही देश बेहतर बनेगा।

दिल्ली हाईकोर्ट के जज रहे और ओडिशा हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एस मुरलीधर ने कहा है कि जो भी सत्ता में हो, उससे सवाल पूछना बेहद ज़रूरी है। उन्होंने कहा है कि इससे ही सत्ता जवाबदेह बनती है और सत्ता को जवाबदेह बनाने का सबसे ठोस तरीका एक मजबूत न्यायपालिका है।

दिल्ली हाईकोर्ट में जज रहने के दारौन दिल्ली दंगे मामले में कड़े फ़ैसले के लिए चर्चित रहे एस मुरलीधर मंगलवार को बेंगलुरु में एक किताब के लॉन्च कार्यक्रम में बोल रहे थे। यह किताब “रेडी फॉर द लॉ चैलेंज” नाम की क्विज बुक है, जिसे उनके पूर्व इंटर्न राघव चक्रवर्ती ने लिखा है। कार्यक्रम में ‘जिज्ञासा, लोकतंत्र और सार्वजनिक जीवन’ पर चर्चा हो रही थी।

एस मुरलीधर ने आरटीआई यानी सूचना का अधिकार आंदोलन की मिसाल देते हुए कहा कि छोटे-छोटे प्रदर्शनों से शुरू होकर आरटीआई कानून बना। लोग स्थानीय प्रशासन से एक साधारण सवाल पूछ रहे थे, ‘इस इलाके में विकास कार्यों के लिए पैसे दिए गए थे, वो कहां गए? हिसाब दिखाइए।’

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा, ‘सत्ता में जो भी हो, उससे सवाल पूछना बेहद ज़रूरी है। लोकतंत्र में जब सरकार जवाब नहीं देती तो अदालत में याचिका दायर की जाती है। फिर सरकार को अदालत में आकर जवाब देना पड़ता है।’

पूर्व जज मुरलीधर ने सफाई कर्मचारी आंदोलन का भी जिक्र किया। 2003 में दायर एक जनहित याचिका यानी पीआईएल के बारे में कहा कि आरटीआई के ज़रिए जो जवाब नहीं मिल पाए, अदालत के ज़रिए उन जवाबों को हासिल किया गया। कई राज्य सरकारों ने शुरू में कहा कि उनके यहां मैनुअल स्कैवेंजिंग नहीं होती। लेकिन वीडियो क्लिप और व्यक्तिगत गवाहियों के बाद उन्हें मानना पड़ा। उन्होंने कहा कि यह लंबा संघर्ष था, लेकिन मैनुअल सफाई जैसी कुप्रथा को खत्म करने की दिशा में बड़ा क़दम था।

उन्होंने कहा कि जिज्ञासा लोकतंत्र में बेहद अहम भूमिका निभाती है। सवाल पूछने की आदत ही लोगों को सशक्त बनाती है।

एस मुरलीधर वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट हैं। उन्होंने अपने करियर में हमेशा लोकतंत्र, मानवाधिकार और जवाबदेही के मुद्दों पर मजबूत रुख रखा है।

जस्टिस मुरलीधर फरवरी 2020 में दिल्ली हाई कोर्ट में दिल्ली दंगों से फ़ैसले के लिए काफ़ी चर्चित रहे। वह तब दंगों से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई कर रहे थे। उन्होंने दिल्ली पुलिस की निष्क्रियता पर कड़ी टिप्पणी की थी और पुलिस को कपिल मिश्रा जैसे बीजेपी नेताओं के खिलाफ हेट स्पीच के लिए एफ़आईआर दर्ज करने पर विचार करने को कहा था। उन्होंने कहा था कि ‘हम इस देश में एक और 1984 नहीं होने देंगे’।

उन्होंने इस मामले में आधी रात को सुनवाई कर घायलों को जीटीबी अस्पताल पहुँचाने, इलाज और राहत मुहैया कराने के निर्देश दिए थे। हालाँकि, ये अंतिम फैसला नहीं था, बल्कि अंतरिम आदेश था और ये सुनवाई के दौरान दिए गए निर्देश थे। 26 फरवरी 2020 की रात को इन आदेशों के कुछ घंटों बाद ही उनका दिल्ली हाई कोर्ट से पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ट्रांसफर कर दिया गया, जिसके बाद वे आगे की सुनवाई नहीं कर सके।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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